लोन चाहिए क्या…

क्या ज़माना आ गया…
आज मेरे पास फ़ोन आया की आपको पर्सनल लोन चाहिए?

मेने कहा मिल जायेगा क्या ?

उन्होंने कहा हां 12.25% सालाना में!

मेने पूछा तीन साल में कितना EMI देना होगा, उसने कहा Rs.10,000/- हर महीने देना होगा |

बस आप को हमारे कंपनी का इंसोरेंस पालिसी लेना होगा 3 साल के लिए जब तक लोन चलेगा, कही आप को कुछ हो जाय तो पालिसी से आप का पैसा कंपनी को मिल जायेगा, जिससे कंपनी को घाटा न हो |

सुनने में अच्छा लगता है की पालिसी सही है पर ये लोन के नाम पर मात्र अपना टारगेट जो पूरा करना होता है  जो उन्हें इन्शुरन्स कंपनी ने दिया होता है, ना ये लोन दिलवाते है न ही लोन दिलवाने में सहायता करते है, ऊपर से पालिसी के प्रीमियम का खर्च और बढ़ जाता है जिसका उन्हें जरूरत नहीं होता |

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कृपया अगर आप के पास भी ऐसा फोन आये तो बेशक लोन की बात करे | अगर वे बोले की आप को अलग से पालिसी लेनी होगी तो बोले पहले लोन पास करवा दो फिर पालिसी लेलेंगे वो भी पैसे बैंक में आने के बाद –karunsah

शराब की दूकान के फायदे

एक शराब की दूकान से कितना रोजगार उत्पन होता है !
जब कोई शराबी 100 रूपए का शराब खरीदता है तो सीधा 30-40 रूपए सरकार को टैक्स के रूप में मिलता है |

शराबी शराब पता है तो कबाड़ियों को उनकी खली बोतल मिलती है जिससे उसका घर चलता है |

धरबि जब ज्यादा नशे में रहता है तो नाले में गिरता है, गिरने के साथ ही उसके जेब में जो भी हो, पर्स, रुपया, मोबाइल, घडी, आदि सभी निकल जाते है, जिनसे किसी परिवार का घर कुछ दिन चलता है |

शराब पीकर सभी सच बोलते है, में तो कहता हूँ अदालत में गवाह को उतना पिला कर गवाही लेनी चाहिए की उसे सहारे की जरूरत पड़े |

शराबी हमेशा निडर रहता है, उसे न आज का भय रहता है न कल की, इसलिए जो खुद को बुजदिल समझते है उन्हें आज नहीं बल्कि अभी से शराबी के केटेगरी में आ जाना चाहिए, और खुद को निडर बनाना चाहिए |

शराबी आदमी बहुत दानी होता है, आप किसी से रोटी मानगो हो सकता है मना कर दे पर शराबी कभी शराब पिलाने से मना नहीं करता बस एक शर्त होती है अगली बार तुम्हे भी पिलाना होगा ||

इतने सरे फायदे होने के कारण मेरे ख्याल से शराब की दूकान हर गली हर चौराहे हर मोहल्ले में खुलनी चाहिए

 

*ये अलग बात है शराब न पिने के बावजूद मेरे में ये सारे खूबी है इसलिए में शराब नहीं पीता –karun sah

आज विश्व पर्यावरण दिवस है

आज विश्व पर्यावरण दिवस है |

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हर साल सेलिब्रिटी लोग पेड़- पौधो को लगते हुए फोटो खिचवाते है, क्या किसी से पूछो तो पिछले साल वाले पेड़ पौधो का क्या हाल है ??

कुछ तो उसी जगह हर साल पेड़ लगा कर विश्व पर्यावरण दिवस मानते है !-Karun Sah

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नए इंस्टिट्यूट(All India Institute of Protest Learning) की जरूरत है भारत में

एक इंस्टीट्यूट होना चाहिए जहां ये सिखाया जाए कि विरोध केसे करते है All India Institute of Protest Learning की स्थापना किया जाय जहा जो नेतागिरी या इलेक्शन लड़ना चाहते है उन्हें 1-2 साल का डिप्लोमा अनिवार्य होना चाहिए ।

इसकी जरूरत इसलिए हो रही है क्युकी अभी जो हमारे देश को विपक्षी दल है न इनके पास संख्या बल है न ही विरोध करने का तरीका ||

आपने भी सुना या देखा हो बहुत बार विरोध करने के लिए पुतला-दहन करते है खुद उसी के चपेट में आ कर हसी के पात्र बनते है, ना ही इनके स्लोगन इतने दमदार होते है न ही उनकी संख्याबल |

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Protest gone horribly wrong: Congress workers set themselves on fire while trying to burn Modi effigy

अगर जनता अभी इनका विरोध नहीं देखेगी तो कैसे भविष्य में जनता कैसे राजनीती में रूचि लेगी |
इसी मुद्दे को लेकर हमे वहारत सरकार से अनुरोध है की आप एक All India institute of protest Learning की स्थापना किया जाय||

सत्ता पक्ष को भी प्रोटेस्ट करना पड़ता है, ये तर्क दिया जाता है की विपक्ष उन्हें काम नहीं करने दे रहा, ये अलग बात है पहले ये भी यही कहते थे ||

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कई बार इसलिए भी विरोध करना पड़ता है क्युकी नेता चुप रहता है, कई बार इसलिए भी नेता हद से ज्यादा बोलता है ||
कई बार सच सामने लाने के लिए तो कई बार सच न सामने आ जाय इसलिए |

प्रोटेस्ट करना भी एक कला है, जो सभी को नहीं आता पर अगर इस इंस्टिट्यूट को बना दिया गया तो सभी को प्रेस्टेस्ट के नय व आसान तरिके सिखाया जायगा

आवेश में या ज्ञान के कमी से ऐसे विरोध किया जाता है जिससे जिनका वे विरोध कर रहे हो वंही तो कोई फर्क नहीं पड़ता ऊपर से उन्हें ही लेने के देने पड़ जाते है

बिना प्रोटेस्ट के राजनीती वैसे ही है जैसे बिना दूध के चाय

क्या दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला ???

क्या दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला ??
नहीं मिला क्युकी BJP दिल्ली में नहीं आयी, जब तक दिल्ली में BJP नहीं आएगी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिलेगा ||
एक बात और यह दिल्ली भी दो है एक बड़ी दिल्ली जिस पर मोदी जी पहले से है, दूसरी दिल्ली जिसे केजरीवाल ने मोदी जी के नाक के निचे से खींच कर जीता |
केजरीवाल भी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा चाहते है BJP भी चाहती थी|
पर बीजेपी उससे पहले खुद को दिल्ली की सरकार में चाहती थी जो हो न सका इसलिए पूर्ण राज्य का वादा भी चुनावी दावा के भेठ चढ़ गया ||

 

मीडिया में सहारनपुर कहां है?

पर्दे और पन्नों पर बार-बार उभरता रहा है- जंगलराज! लेकिन उत्तर प्रदेश में सरकार क्या बदली, मीडिया का वह ‘जंगलराज’ ग़ायब ! योगी जी के ‘रामराज’ को भला ‘जंगलराज’ कहने का दुस्साहस कौन करे!

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सहारनपुर से लौटे एक युवा रिपोर्टर ने यह कहकर मुझे चौंका दिया कि जिन दिनों वहां पुलिस मौजूदगी में सवर्ण-दबंगों का तांडव चल रहा था, दिल्ली स्थित ज्यादातर राष्ट्रीय न्यूज चैनलों और अखबारों के संवाददाता या अंशकालिक संवाददाता अपने कैमरे के साथ शब्बीरपुर और आसपास के इलाके में मौजूद थे, लेकिन ज्यादातर चैनलों और अखबारों में शब्बीरपुर की खबर नहीं दिखी.

उन दिनों ज्यादातर चैनलों की खबरों में जस्टिन बीबर छाये हुए थे और लाखों रुपये खर्चकर उनके कार्यक्रम में मुंबई जाने वालों के इंटरव्यू दिखाये जा रहे थे.

देश के कथित राष्ट्रीय मीडिया के मुख्यालयों से सहारनपुर की दूरी महज 180 किमी की है. पर मीडिया दिल्ली सरकार के हटाये गये एक बड़बोले मंत्री की बागी अदाओं पर फिदा था.

तीन तलाक़ की उबाऊ बहसों से टीवी चैनल अटे पड़े थे. गोया कि भारतीय मुसलमान की सबसे बड़ी समस्या तीन तलाक़ ही हो, जबकि इस समुदाय में महज 0.56 फ़ीसद तलाक़ होते हैं.

दूसरी तरफ, पश्चिम यूपी के शब्बीरपुर को जलाया जा रहा था. पुलिस की मौजूदगी में घर के घर उजाड़े गये. घरों में कुछ भी नहीं बचा.

साइकिलें, चारपाइयां, कुछ छोटे-बड़े डब्बों में रखा राशन, कढ़ाई में बनी सब्जियां, अंबेडकर की किताबें और बच्चों के स्कूली बस्ते भी जलकर ख़ाक हो गए.

महज बीस दिनों में तीसरी बार सहारनपुर का यह इलाक़ा सुलग रहा था. पर देश के बड़े न्यूज़ चैनलों और ज़्यादातर अख़बारों के लिये यह ख़बर नहीं थी.

अगर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ जैसे अख़बार, एनडीटीवी इंडिया जैसे चैनल, ‘नेशनल दस्तक’ और ‘द वॉयर’ जैसी न्यूज़ वेबसाइटों ने इसे न कवर किया होता तो देश को सहारनपुर की सच्चाई शायद ही पता चल पाती.

‘जंगलराज’ का कोरस ग़ायब

यूपी या देश के कई प्रदेशों में ऐसी घटनाएं पहले से होती रही हैं और सिलसिला आज तक जारी है. पर हिंदी पट्टी के राज्यों में जब कभी किसी दलित या पिछड़े वर्ग के नेता की अगुवाई वाली सरकारें होती हैं, ऐसी घटनाओं के कवरेज में मीडिया, ख़ासकर न्यूज़ चैनल और हिन्दी अख़बार ‘बेहद सक्रिय’ दिखते रहे हैं-अच्छी तथ्यपरक रिपोर्टिंग मे नहीं, ‘जंगलराज’ का कोरस गाने में.

हर किसी आपराधिक घटना, हादसे या उपद्रव को मीडिया का बड़ा हिस्सा उक्त सरकारों की नाकामी से उपजे ‘जंगलराज’ के रूप में पेश करता आ रहा है.

पर्दे और पृष्ठों पर बार-बार उभरता रहा है-जंगलराज! लेकिन उत्तर प्रदेश में सरकार क्या बदली, मीडिया का वह ‘जंगलराज’ ग़ायब! योगी जी के ‘रामराज’ को भला ‘जंगलराज’ कहने का दुस्साहस कौन करे!

सहारनपुर में सामुदायिक और सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं पहले भी होती रही हैं. लेकिन इस बार एक फ़र्क़ नज़र आता है. ख़बर के बजाय तमाशे पर टिके रहने वाले न्यूज़ चैनलों की छोड़िये, पश्चिम उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक प्रसारित हिन्दी अख़बारों ने भी इस पहलू को प्रमुखता से नहीं कवर किया.

सांप्रदायिक-सामुदायिक तनाव की घटना की शुरुआत इस बार अंबेडकर जयंती के जुलूस से हुई. तब तक यूपी में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार आ चुकी थी. भाजपा के स्थानीय सांसद, कई-कई विधायक और नेता इस जुलूस के साथ थे.

जुलूस के ज़रिये दलित और अल्पसंख्यक समुदाय के बीच तनाव और टकराव पैदा करने की भरपूर कोशिश की गई. स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने कड़ाई से निपटना चाहा तो उन्मादी भीड़ ने एसएसपी के बंगले पर हमला कर दिया.

बाद में उक्त एसएसपी का तबादला कर दिया गया, मानो सारे घटनाक्रम के लिए वह अफ़सर ही दोषी रहा हो! भाजपा या राज्य सरकार ने स्थानीय सांसद, विधायक या नेताओं के ख़िलाफ़ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की.

आंबेडकर के नाम पर भाजपा-समर्थकों का यह जुलूस एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश कर रहा था. दलितों में यह भ्रम पैदा करने की कि सवर्ण वर्चस्व की ‘हिन्दुत्व-पार्टी’ अब दलितों के प्रिय नेता अंबेडकर को तवज्जो देने लगी है और दूसरा कि मुसलमान इस आयोजन में बाधा बन रहे हैं.

देश के किसी कथित राष्ट्रीय या क्षेत्रीय टीवी चैनल ने उस वक्त इस पहलू पर अपने सांध्यकालीन सत्र में बहस नहीं कराई. तब सारे चैनलों पर ‘यूपी में योगी-योगी’ का जयगान चल रहा था.

ऊपरी तौर पर हाल के उपद्रव या हिंसक हमले की जड़ में था-महाराणा प्रताप की शोभा यात्रा और उक्त जूलूस के दौरान तेज़ आवाज़ में ‘डीजे’ का बजना.

बताया जाता है कि यह आयोजन बिल्कुल झारखंड में रामनवमी के जूलूसों की तरह था. गाजे-बाजे के साथ हथियारों से लैस उन्मादी युवाओं का सैलाब. इसमें एक ख़ास दबंग सवर्ण जाति के लोगों की संख्या ज़्यादा थी.

Violence in Saharanpur

गांव और आसपास के इलाक़े में खेती-बाड़ी और अन्य काम-धंधे पर इन जातियों का ही वर्चस्व है. दलितों के पास यहां खेती-बाड़ी की ज़मीन बहुत कम है. अनेक परिवार पशुपालक भी हैं.

कुछ लोग छोटे-मोटे धंधे से जीवन-यापन करते हैं, जबकि कुछ नौकरियों में हैं. सामाजिक-राजनीतिक रूप से वे अपेक्षाकृत जागरूक और मुखर माने जाते हैं.

‘भीम सेना-भारत एकता मिशन’ इनका एक उभरता हुआ नया मंच है. चंद्रशेखर नामक एक युवा वकील इसके प्रमुख नेताओं में हैं. अलग-अलग नाम से इस तरह के संगठन देश के अन्य हिस्सों में भी बन रहे हैं. बसपा से निराश दलितों के बीच ये तेज़ी से लोकप्रिय भी हो रहे हैं.

जयंतियों पर हथियारबंद जूलूस क्यों?

सहारनपुर में हिंसा और उपद्रव के संदर्भ में सबसे पहला सवाल जो मीडिया को उठाना चाहिए था, वह ये कि 14 अप्रैल को यहां भाजपा नेताओं की अगुवाई में निकाले गए जुलूस के दौरान भारी हिंसा हुई थी और उन्मादी भीड़ ने कुछ लोगों के उकसावे पर जिले के एसएसपी के बंगले तक पर हमला किया, ऐसे में प्रशासन ने फिर किसी ऐसे जुलूस को निकलने ही क्यों दिया?

बीते 5 मई को महाराणा प्रताप जयंती के नाम पर सवर्ण दबंगों को पारंपरिक हथियारों और आग्नेयास्त्रों के साथ जुलूस निकालने क्यों दिया गया? यह एक ऐसा सवाल है, जिसका सहारनपुर के जिला प्रशासन या समूची योगी सरकार के पास कोई भी तर्कसंगत जवाब नहीं.

इन शोभा यात्राओं और जूलूसों पर प्रशासन की तरह मीडिया का बड़ा हिस्सा भी ख़ामोश रहता है, या तो वह इन्हें बढ़चढ़ कर कवर करता है या इन्हें सामान्य घटना के रूप में लेता है.

समाज को बांटने और टकराव बढ़ाने वाले ऐसे जुलूसों को वह सिरे से ख़ारिज क्यों नहीं करता? अगर मीडिया ऐसा करता तो प्रशासन पर इसका भारी दबाव पड़ता और वह ऐसे जुलूसों को रोकने के लिए मजबूर हो जाता.

मीडिया ऐसा करके निहित स्वार्थ से प्रेरित उन्मादी जुलूसों के ख़िलाफ़ पब्लिक ओपिनियन बना सकता था. पर देश के ज़्यादातर हिस्सों में सांप्रदायिक य़ा सामुदायिक तनाव पैदा करने वाले ऐसे जूलूस एक तरह का दैनन्दिन कर्मकांड बनते जा रहे हैं और मीडिया का बड़ा हिस्सा उनके शांतिपूर्ण समापन या रक्तरंजित होने का मानो इंतज़ार करता है!

दूसरा अहम सवाल 5 मई के घटनाक्रम को लेकर उठना चाहिए था. जिस दिन शब्बीरपुर गांव में दलितों पर हमला हुआ, पूरे पांच घंटे हमला जारी रहा. घटनास्थल से लौटे पत्रकारों के मुताबिक उस वक्त पुलिस भारी मात्रा में वहां मौजूद थी. फिर उसने दबंग हमलावरों को रोका क्यों नहीं?

क्या पुलिस-प्रशासन का उस दिन सवर्ण समुदाय के दबंग हमलावरों को समर्थन था? पुलिस ने बाद में दलितों की पंचायत रोकी. पर पांच घंटे का हमला क्यों नहीं रोका? मीडिया में यह सवाल कितनी शिद्दत से उठा?

सहारनपुर के दलित वकील चंद्रशेखर सवाल उठाते हैः ’ख़ून तो सबका एक सा है फिर यह पूर्वाग्रह क्यों?’ समाज में जो पूर्वाग्रह हैं, उनकी अभिव्यक्ति सिर्फ़ शासन और सियासत तक सीमित नहीं है, वह मीडिया में भी है. अब कुछ चैनलों को चंद्रशेखर में दलित-आक्रोश के पीछे का चेहरा नज़र आ रहा है. पता नहीं, उसे नायक बनाना है या खलनायक?

सहारनपुर में सांप्रदायिक और सामुदायिक तनाव व हिंसा को लेकर तीसरा सवाल है- इसके राजनीतिक संदर्भ का. क्या इस तरह की जातीय गोलबंदी के पीछे कुछ शक्तियों के कोई सियासी स्वार्थ भी हैं?

कुछ माह बाद होने वाले स्थायी निकाय चुनावों से तो इनका कोई रिश्ता नहीं? दलितों और अल्पसंख्यकों के बीच एकता की संभावना से किसे परेशानी है? क्या कुछ लोगों को ऐसी एकता से किसी तरह का राजनीतिक भय है?

क्या यह सब किसी योजना के तहत शुरू हुआ, जो बाद के दिनों में अनियंत्रित हो गया. और अब शांति की बात हो रही है! मीडिया के बड़े हिस्से ने सहारनपुर के संदर्भ में ऐसे सवालों को नहीं छुआ.

(Via : https://goo.gl/2l6qcC)

जन समर्थन

क्यों ना Entertainment tax /मनोरंजन कर के साथ सेना विकास सेस लगा दिया जाए, क्युकी entertainment Industry बहुत बड़ी है, जो इसका आनद लेते है वे सम्पन लोगो में आते है जिन्हे 1-2% अतिरिक्त कर से कुछ फर्क नहीं पड़ेगा और इससे हमारे सेना को अधिक शक्तिशाली बनाया जा सकता है

इसमें क्रिकेट मैच, फुटबॉल , टेनिस जैसे खेलो के टिकट में भी लगाया जाना चाहिए, बेशक जो खेल अभी पिछड़े है जैसे हॉकी, कुश्ती जैसे खेलो को इस कर से रहत मिलती रहे

हम देखते है की हर हफ्ते 2-3 फिल्मे रिलीज़ होती है और ज्यादातर अच्छा बिज़नेस करती है, अगर ये कर लगा हो तो देश की सैन्य शक्ति को बढ़ावा मिलेगा और हमे सैनिको के सुरक्षा में अतिरिक्त फण्ड मिल जायगा |
जैसे अगर कोई अच्छी फिल्म 100 करोड़ का कलेक्शन करती है तो उस कर 1% सेना सुरक्षा सेस लगा देने पर 1 करोड़
अगर हर हफ्ते 3 फिल्मे भी रिलीज़ हुई तो लगभग 150 करोड़ अलग से सेना के पास आ जायेंगे |

बाकि अन्य क्षेत्र भी है जैसे होटल, मैच टिकट, etc.जहा से भी अच्छा खासा कर जमा हो सकता है

 

दिल्ली to नोएडा

कुछ दिन पहले मैं किसी काम से नोएडा गया था यह मेरा योगी सरकार आने के बाद पहला सफर था मैं सेक्टर 12 नोएडा के बस स्टैंड पर खड़ा था | उस स्टैंड के ठीक पीछे पुलिस चौकी थी साथ में एक छोटा सा पान मसाले का स्टाल था | मैंने सुना था कि कि यूपी के सभी सरकारी दफ्तरों मैं पान मसाला व गुटखा बंद हो चुका है |अगर यह दुकान वहां थी तो जरूर उस चौकी के लोग भी खाते ही होंगे||downloadचूँकि मैं पान मसाला या गुटखा नहीं खाता था तो मैंने एक कोल्ड ड्रिंक की छोटी बोतल ली जिसका दाम दुकानदार ने 15 रूपय बताएं, मुझे लगा शायद यूपी में 15 रुपए में ज्यादा क्वांटिटी मिलती होगी पर उसने 200ML की बोतल दी जिस पर 10 रुपय लिखे थे आश्चर्य इस बात का था की ठीक पुलिस चौकी के मेन गेट के पास दुकान चला रहा था और MRP से 50% ज्यादा दाम पर समान बेच रहा था मेरा उस दुकान की फोटो खींचने का साहस नहीं हुआ क्योंकि जो चौकी के पास दुकान लगा कर अनाप-शनाप दाम ले रहा हो तो जरूर उसकी पहुंच भी होगी ||

 

सच्चा उम्मीदद्ववार अच्छा उमीदद्वार

23 अप्रैल को MCD इलेक्शन है मैं चाहता हूं कि आप अपने क्षेत्र के ईमानदार पढ़े लिखे वह वह स्वच्छ छवि वाले नेता को अपना अमूल्य वोट दे चाहे वह कांग्रेस /भाजपा या आप पार्टी या अन्य स्वतंत्र उम्मीदवार हो, क्योंकि हमारे ही वोट से उम्मीदवार के जीत का अंतर बढ़ता है अगर हम सही उम्मीदवार को वोट देंगे तो वह जरूर जीतेगा अगर नहीं भी तेगा तो उसके हारने का अंतर कम हो जाएगा।

बहुत से लोग पार्टीयो की हवा में बह कर जैसे-तैसे को अपना नेता चुन लेते है जो न तो सदन में किसिस मुद्दे को उठाते है नहीं जनता के लिए कार्य करते है | जिसका खामियाज़ा जनता पुरे पांच साल तक भूकतना पड़ता है |

अगर सही उम्मीदवार विपक्ष मैं भी हो तो वह सत्ताधारी पक्ष की कमियां सामने लाने का प्रयास करेगा और जिस से सत्ताधारी पक्ष पर काम करने का दबाब बना रहेगा |

इसलिए हमें किसी पार्टी या पक्ष को ना देख कर उस उम्मीदवार को देखना चाहिए की वह इस क्षेत्र का विकास तथा जनता का सम्मान करें और हमारे बीच जैसे अभी आ रहे हैं वैसे चुनाव के बाद भी आए –karunsah

चुनाव का ड्रामा

जिस देश में लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्यौहार चुनाव को कहते है, उसी देश के किसी राज्य में मात्र 6% वोटिंग |

जहाँ दिल्ली जो देश की राजधानी है, फिर भी वहाँ वोटिंग 50% से कम वो भी 46% ही होती है, क्यों ???

ज्यादा वोट चाहे किसी भी उमीदवार को मिले, पर जीत तो वोट न डालने वालो की ही हुई होगी

हमारे पास यह दो  उपचुनाव का उदाहरण है, कश्मीर और दिल्ली |

मेरा मानना है वोटिंग अनिवार्य होना चाहिए सभी के लिए, बस उसमे कुछ उपवाद हो सकते है जो किसी उचित कारण न कर पाए हो  |

जब हमारे पास NOTA(Not OF The Above) का विकल्प हो तो कोई कारण नहीं वोट न करने का |

सरकार को एक सीमा तय करना चाहिए की अगर इस से कम वोटिंग होगी तो उस राज्य में 6 महीने तक सैनिक शासन या राष्टपति शासन लग जायेगा |, जैसे 75% , 70%.
इसके साथ वोटर को वोटिंग स्लिप भी देनी चाहिए जिसे वे अन्य सरकारी योजना में लाभ मिले जैसे सब्सिडी, इसके साथ बैंक से लोन  या क्रेडिट कार्ड लेने के लिए भी जरुरी हो, क्युकी, सभी कहते है की आमिर लोग वोट डालने कम जाते है, पर वे लोन और क्रेडिट कार्ड जरूर लेते है | जिससे उन्हें भी वोट डालना जरुरी हो जाएImage result for electionहमारी सरकार और चुनाव से गुजारिश है हमारे दिए गए सुझाव पर ध्यान दे-karunsah