मेवा की सेवा

चौपालः मेवा की सेवा

कवि धूमिल ने कहा था- ‘एक आदमी रोटी बेलता है/ एक आदमी रोटी खाता है/ एक तीसरा आदमी भी है/ जो न रोटी बेलता है/ न रोटी खाता है/ वह सिर्फ रोटी से खेलता है/ मैं पूछता हूं- यह तीसरा आदमी कौन है? मेरे देश की संसद मौन है।’

सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

कवि धूमिल ने कहा था- ‘एक आदमी रोटी बेलता है/ एक आदमी रोटी खाता है/ एक तीसरा आदमी भी है/ जो न रोटी बेलता है/ न रोटी खाता है/ वह सिर्फ रोटी से खेलता है/ मैं पूछता हूं- यह तीसरा आदमी कौन है? मेरे देश की संसद मौन है।’ हाल ही में पूर्व सांसदों और विधायकों को आजीवन पेंशन और भत्ते दिए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, लोकसभा और राज्यसभा के महासचिव को नोटिस जारी किया। सर्वोच्च अदालत ने यह नोटिस उत्तर प्रदेश के एक एनजीओ की याचिका पर जारी किया जिस पर लोकसभा में माननीय संसद सदस्यों ने कड़ी एतराज जताया। जनहित याचिका में कहा गया है कि पूर्व सांसदों और विधायकों को आजीवन पेंशन दी जा रही है जबकि ऐसा कोई नियम नहीं है। यदि एक दिन के लिए भी कोई सांसद बन जाता है तो वह न केवल आजीवन पेंशन का हकदार हो जाता है, बल्कि उसकी पत्नी को भी पेंशन मिलती है। साथ ही वह जीवन भर एक साथी के साथ ट्रेन में मुफ्त यात्रा करने का अधिकारी हो जाता है जबकि राज्य के राज्यपाल को भी आजीवन पेंशन नहीं दी जाती। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के वर्तमान जजों को भी साथी के लिए मुफ्त यात्रा का लाभ नहीं दिया जाता चाहे वे आधिकारिक यात्रा पर ही क्यों न जा रहे हों। मगर पूर्व सांसदों को यह सुविधा मिलती है। यह व्यवस्था आम लोगों पर बोझ है और यह राजनीति को और भी लुभावना बना देती है। यह खर्च ऐसे लोगों पर किया जाता है जो जनता का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं। एक बार जनप्रतिनिधि चुने जाने पर आजीवन अकूत सुविधाओं का हकदार बन जाना एक गरीब और लोकतांत्रिक देश में कानूनी तौर पर भले वाजिब ठहरा दिया जाए, नैतिक रूप से उचित कतई नहीं ठहराया जा सकता है।

कोर्ट ने माना कि 80 प्रतिशत संसद करोड़पति हैं। माना कि अपने वेतन, भत्ते और पेंशन तय कर कानून बनाने का हक उन्हें ही है, तो क्या वे अतार्किक और नाजायज राशि तय कर सकते हैं? इसकी समीक्षा तो होनी ही चाहिए। मीडिया से जनता को जो सूचनाएं मिलती हैं उनके मुताबिक निर्वाचित जनप्रतिनिधि पांच साल की अवधि में अपनी धन संपदा में 900 गुना तक का इजाफा कर लेते हैं। इतना धन कहां से आया, यह तो पूछा ही जाना चाहिए। फिर अब जब, जनप्रतिनिधियों ने अपने भाषणों, आचरण और स्वीकारोक्तियों में मान लिया है कि राजनीति लोक सेवा नहीं रह गई; वह प्रोफेशन और व्यापार बन गई है तो पूर्व विधायकों और सांसदों को पेंशन व अन्य भत्ते क्यों दिए जाएं? कुछ माह पूर्व उत्तराखंड के एक पूर्व विधायक का स्टिंग वीडियो मीडिया में चर्चा का विषय रहा जिसमें उन्हें कहते पाया गया कि अपनी तनख्वाह को वे छूते तक नहीं, पूरी की पूरी खाते में जमा होती है। अपने खर्च के लाखों रुपए तो वे मुख्यमंत्री को हड़का कर ले आते हैं।

जनता अब अपने धन की इस लूट को रोकना चाहती है तो इसमें गलत क्या है! सेवक को कितनी मजदूरी, वेतन, भत्ता और पेंशन देनी है, यह तय करने का हक मालिक या नियोक्ता का ही है न? तब सांसदों का गुस्सा जायज नहीं है। होना तो यह चाहिए कि जैसे लोगों ने एलपीजी सब्सिडी स्वेच्छा से छोड़ी वैसे ही जो सांसद संपन्न हैं वे पेंशन लेना छोड़ दें। आज 80 से 90 फीसद सांसद करोड़पति हैं। वे क्यों न उनका अनुसरण करें जिन्होंने एलपीजी सब्सिडी छोड़ी है? मोदीजी और अमित शाह भाजपा सांसदों से क्यों न इसकी शुरुआत करवाएं?

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